उत्तम क्षमा धर्म: मुक्ति का प्रथम द्वार है

आभास जैन एड. भोपाल

आज से जैनधर्म के दस दिवसीय पयुर्षण पर्व प्रारंभ होने जा रहे है ये दस दिवसीय पर्व किसी विशिष्ट देव की अराधना मात्र नहीं हैं ये पयुर्षण पर्व वास्तव में स्वयं को परिष्कृत करने के दस चरण हैं जिन्हे क्रमशः उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सत्य, उत्तम शौच, उत्तम सयंम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम ब्रहम्चर्य और उत्तम अकिंचन के साधना हेतु क्रमिक परिभाषित किये गये है उसी क्रम में आज उत्तम क्षमा धर्म का दिन है। आत्मक्रमोन्नति के गुण के कारण इसे पयुर्षण पर्वाधिराज कहा गया है।

जो क्षमा को साध लेगा उसका अहंकार स्वतः ही गल जायेगा और उसके जीवन में धर्म का दूसरा लक्षण उत्तम मार्दव निश्चित प्रकट होगा। दस चरणों में संपन्न होने वाली साधना क्रम में उत्तम क्षमा धर्म को प्रथम रखने के पीछे मनोविज्ञानिक कारण है कि क्रोध, वैमनस्य, शत्रु भाव और घृणा से भरा हुआ व्यक्ति आत्म साधना में एकाग्र नहीं हो सकता इसलिए आचार्यो ने साधना के प्रथम चरण में क्षमाधर्म को प्रतिपादित किया है, इस प्रथम दिन साधक संसार के समस्त जीवों से सर्वप्रथम क्षमा याचना करता है और स्वयं भी दूसरों को क्षमा करके स्वयं को विकल्पों से मुक्त करता है, ये ऐसा क्षण है जहां संसार में मेरा कोई शत्रु नहीं का भाव साधक के मन प्रवेश करता है और जिसका कोई शत्रु नहीं ऐसा मनुष्य स्वयं भय मुक्त होकर अन्य को भी भय से मुक्त करता है । साधना के क्रम का प्रथम नियम यही है कि साधक सर्व जीवों के प्रति वात्सल्यता के भाव को धारण करे और वात्सल्य भाव को धारण करने वाला ह्रदय ही स्वात्मा में प्रवेश करने के वाले प्रथम द्वार को खोल सकता है । इसे साधने वाला साधक बहते हुए गंगा जल सा निर्मल हो जाता है, क्षमा करना साधारण बिषय नहीं है क्षमा करने के लिए आत्मा को परम उदार होना होगा और क्षमा मांगने के लिए स्वयं के स्वभाविक अहंकार से मुक्त होना होगा इसलिए आचार्यो ने कहा है क्षमा वीरस्य भूषणं।

क्षमा सहनशीलता की पर्याय है क्षमा संसार भ्रमन करती हुई चेतना की मुक्ति का प्रथम द्वार है। स्वयं की भूल का ज्ञान होना क्षमा को सार्थक करता है ये पर्व स्वयं का आंकलन करना, स्वयं का संधारण करना, स्वयं को परिष्कृत करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है, क्षमा धर्म से संघर्ष थमता है, परिवारों के मध्य विवादों का क्षय होता है । क्षमा मात्र औपचारिकताओं का निर्वहन नहीं है ये मनुष्य का नेसर्गिक स्वभाव है जिसे धारण करकेे संपूर्ण मानव जाति शांति का अनुभव कर सकती है । क्षमा आज संपूर्ण पृथ्वी की आवश्यकता है जिसे सभी जीवों को स्वयं के प्रति और अन्य के प्रति अवश्य धारण करना चाहिए ।

 

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