अपनी श्रद्धांजलि स्वयं लिखिए

आभास जैन
(अधिवक्ता एवं विचारक)
प्रत्येक मनुष्य एक कोरी किताब के समान जन्म लेता है, उस किताब में उसके कृत्यों की कथायें उकेरती जाती हैं परंतु ये उसके पुरूषार्थ पर ही निर्भर करता हैं कि उन कथाओं को संसार स्मरण करेगा या विस्मरण करेगा । अनेकों किताबें इस कालचक्र में विलुप्त हो गई तो अनेकों किताबें उदाहरण बनकर आज भी मानव समाज की दिग्दर्शिका बनकर भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं ।
प्रत्येक जीवन की उत्पत्ति का कोई उद्देश्य अवश्य होता है, इस संसार में निरर्थक कुछ भी नहीं है, परंतु कोई अपने होने के अर्थ को ढूंढ़ लेता है तो कोई किताब अर्थहीन ही रह जाती है । जब किताब के सारे पृष्ठ भर जाते हैं, और आखिरी पृष्ठ अपना अंतिम निष्कर्ष उकेर रहा होता है, तब किताब को अहसास होता है कि पिछले पृष्ठों में ऐसा कुछ नहीं, जिसकी संक्षेपिका अंतिम पृष्ठ पर लिखी जा सके, परंतु किताब खाली नहीं रहेगी, उसे पूर्ण होना ही होगा, तब किताब ने अपना सारा जीवन जिन किताबों के मध्य गुजारा था, वे किताबें उस किताब के अंतिम पृष्ठ पर निष्कर्ष उकेरती हैं, लेकिन सामाजिक मर्यादायें और किताब की अंतिम समय की दयनीय दशा बाकि किताबों को करूणा और औपचारिकतावश सत्य नहीं लिखने देती ऐसी स्थिति में उस किताब का आखिरी पन्ना असत्य निष्कर्ष के साथ समाप्त हो जाता है और किताब बंद हो जाती है ।
जीवित किताबों को यह समझ ही नहीं आता कि आखिर उस किताब का क्या निष्कर्ष लिखे जिसके पिछले पृष्ठ जीर्ण-शीर्ण, अस्त-व्यस्त हैं, परंतु पन्ना अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता इसलिए उस अंतिम पन्ने पर वो लिखा जाता है, जो उस किताब का बिषय था ही नहीं । इसलिए अपनी प्रत्येक श्वांस का और अपने जीवन के प्रत्येक क्षण का उपयोग कीजिए, क्योंकि यदि एक भी किताब अर्थहीन होती है तो ये मानव सभ्यता के क्रमिक विकास की अपूरर्णीय क्षति है । ये अंतिम पन्ना अमर हो जाये दूसरी किताबें उस अंतिम पृष्ठ से छेड़छाड़ न करें इसलिए प्रत्येक मनुष्य को अपनी जीवन रूपी किताब में अपने जीवन का अर्थ उकेरना चाहिए ।
साधारण शब्दों में कहा जाये तो किताब के समापन पर उसके अंतिम पृष्ठ पर लिखने के लिए श्रद्धांजलि की सामग्री उसे स्वयं अन्य किताबों को देकर जाना चाहिए ताकि कोई सामाजिक मर्यादा उस किताब को अर्थहीन न कह सके ।





