भगवान अग्रसेन ने दिया समानता और मानवता का संदेश

भगवान अग्रसेन के सच्चे समाजवाद का प्रतीक है एक-ईंट और एक-रूपये का चलन

भगवान अग्रसेन जयंती 11 अक्टूबर पर विशेष

समाज की उन्नति तभी संभव है, जब हर व्यक्ति एक-दूसरे के सुख-दुख में बने सहभागी

भगवान अग्रसेन जी का जन्म आश्विन् सुदी एकम् को मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की चैंतीसवी पीढ़ी में सूर्यवशीं क्षत्रिय कुल के महाराजा वल्लभ सेन के घर में द्वापर के अन्तिमकाल और कलयुग के प्रारम्भ में 5185 वर्ष पूर्व हुआ था। माता माँ लक्ष्मी की कृपा से भगवान अग्रसेन के 18 पुत्र थे। भगवान अग्रसेन ने अपने राज्य को 18 गणों में विभाजित कर अपने 18 पुत्रों को सौंप दिया था। उन्होंने 18 गुरुओं के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना की थी। हर गोत्र अलग होने के बावजूद वे सब एक ही परिवार के अंग बने रहे। इसी कारण अग्रोहा भी सर्वंगिण उन्नति कर सका। यज्ञों में बैठे 18 गुरुओं के नाम पर ही अग्रवंश (अग्रवाल समाज) की स्थापना हुई। अग्रसेन जी के राज में कोई भी व्यक्ति दुखी या लाचार नहीं था। भगवान अग्रसेन जी बचपन से ही प्रजा की भलाई और अपने राज्य की उन्नति के लिए लगातार प्रयत्नशील रहते थे। जिस कारण अग्रसेन जी वहां की प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू एवं एक क्षत्रिय सूर्यवंशी राजा थे।

समाज को दिया एक ईंट-एक रूपये का सिद्धान्त
भगवान अग्रसेन के राजकाल में अग्रोहा ने दिन दूनी-रात चैगुनी उन्नति की। कहते हैं कि इसकी चरम स्मृद्धि के समय वहां लाखों व्यापारी रहा करते थे। वहां आने वाले नवागत परिवार को राज्य में बसने वाले परिवार को सहायता के तौर पर एक रुपया-एक ईंट भेंट करते थे। इसका एक उदाहरण है कि एक बार अग्रोहा में अकाल पड़ा। तब चारों ओर त्राहि-त्राहि हो गई अव्यवस्था होने लगी। ऐसे में समस्या का समाधान ढूंढने के लिए अग्रसेन जी ने भेष बदल कर सहायता शिविर में गए, उन्होंने देखा कि एक परिवार में मात्र चार सदस्यों का ही खाना बना था। किन्तु खाना प्रारम्भ करते समय एक अतिरिक्त मेहमान आ गया, जिसके कारण भोजन की समस्या हो गई। ऐसे में परिवार के सदस्यों ने चारों थालियों में से थोड़ा-थोड़ा भोजन निकालकर एक पाँचवी थाली परोस दी। सभी के भोजन की समस्या का समाधान हो गया। भगवान अग्रसेन को इस दृश्य ने काफी प्रभावित किया और यह वृतांत सभासदों को बताया और एक-ईंट और एक-रूपया सिद्धान्त की घोषणा की। जिससे ईंटों से वह अपने घर का निर्माण करें और रूपये से अपना व्यापार स्थापित कर अपने परिवार का पालन-पोषण कर सके। एक-ईंट और एक-रूपये का यह चलन अग्रवालों की पहचान बन गया जो भगवान अग्रसेन के सच्चे समाजवाद का प्रतीक है एवं आज भी यह सिद्धान्त प्रासंर्गित हैं।

भगवान अग्रसेन के सिद्धांत आज भी महत्वपूर्ण
आज जब समाज तेजी से बदल रहा है और लोगों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, ऐसे समय में भगवान अग्रसेन के सिद्धांत, सहयोग और भाईचारे के विचार पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार दूसरे व्यक्ति की मदद करे, तो अनेक समस्याओं का समाधान स्वयं संभव हो सकता है।
भगवान अग्रसेन के जीवन से जुड़ी सबसे प्रेरणादायक परंपराओं में आपसी सहयोग और समानता की भावना प्रमुख है। उनके विचारों का मूल संदेश यही था कि समाज का विकास केवल कुछ लोगों की समृद्धि से नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों की प्रगति और उन्नति से होता है। उनका मानना था कि जरूरतमंद व्यक्ति को सहयोग देना और उसे समाज की मुख्यधारा से जोड़ना एक स्वस्थ एवं मजबूत समाज की पहचान है। उनकी प्रेरणा यह सिखाती है कि व्यापार केवल धन कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान देने का भी एक महत्वपूर्ण साधन है। उन्होंने समाज को सिखाया कि ईमानदारी, मेहनत, लगन, विश्वास और सामाजिक जिम्मेदारी किसी भी व्यवसाय की मजबूत नींव हो सकती है।
अग्रवाल समाज आज व्यापार, उद्योग, शिक्षा, राजनैतिक, चिकित्सा, प्रशासन और विभिन्न क्षेत्रों में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। यह उपलब्धियां भगवान अग्रसेन जी की उस विचारधारा की याद दिलाती हैं, जिसमें परिश्रम और समाज के प्रति जिम्मेदारी को विशेष महत्व दिया गया।

अग्रसेन वाटिका पर हो रही नियमित महाआरती
भोपाल के अग्रसेन वाटिका पर अग्रवाल समाज द्वारा महीने के प्रथम रविवार को महाआरती की जा रही है एवं उनकी प्रतिमा पर नियमित माल्यार्पण भी किया जा रहा है। महाआरती में अग्रवाल समाज के लोग काफी संख्या में उपस्थित होकर जजमानी करते है। आज भी अग्रवाल समाज भगवान अग्रसेन के करूणामीय स्वभाव, युग पुरूष, महादानी और राम राज्य के समर्थक के सिद्धांतों को अपनाकर राष्ट्र निर्माण में अपना विशेष योगदान दे रहा है।
भगवान अग्रसेन जी की जयंती मनाने का एक अवसर नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों और आदर्शों के साथ ही उनके विचारों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेने का दिन है। भगवान अग्रसेन ने समाज को समानता, सहयोग, सेवा, परिश्रम और भाईचारे का संदेश दिया। भगवान अग्रसेन की सबसे बड़ी सीख थी कि समाज की उन्नति तभी संभव है, जब हर व्यक्ति एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बने। उन्होंने समाज में किसी को छोटा-बड़ा नहीं मानते हुए सभी को सम्मान और समान अवसर देने की भावना को प्रोत्साहित किया। उनकी विचारधारा में व्यापार के साथ-साथ समाजसेवा और जरूरतमंदों की सहायता को भी विशेष महत्व दिया गया।
आज के बदलते दौर में भगवान अग्रसेन के आदर्श और भी प्रासंगिक हो गए हैं। हमें उनकी शिक्षाओं को केवल आयोजनों और जयंतियों तक सीमित न रखकर अपने व्यवहार और सामाजिक जीवन में उतारना चाहिए। समाज में शिक्षा, रोजगार, सेवा और सहयोग की भावना को अधिक से अधिक बढ़ावा देना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आइए, भगवान अग्रसेन जी की जयंती के अवसर पर हम संकल्प लें कि समाज में एकता बढ़ाएंगे, जरूरतमंदों की सहायता करेंगे और आने वाली पीढ़ी को सेवा, संस्कार एवं सद्भाव का मार्ग दिखाएंगे।

विनीत अग्रवाल
लेखक एवं समाजसेवी

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