राहुल गांधी के बयान पर बवाल: 200+ पूर्व नौकरशाह और सैन्य अफसरों ने मांगी माफी

नई दिल्ली
संसद भवन परिसर में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस के हालिया विरोध-प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। 204 सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों, पूर्व नौकरशाहों, पूर्व राजनयिकों और वकीलों ने राहुल गांधी से उनके आचरण के लिए देश से माफी मांगने की मांग की है। मंगलवार को पूर्व अधिकारियों ने राहुल गांधी के नाम लिखी एक खुली चिट्ठी जारी की जिसमें कहा गया है कि 12 मार्च को संसद परिसर में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान गांधी और अन्य सांसदों का व्यवहार संसदीय मर्यादा और संस्थागत गरिमा के खिलाफ था।

पत्र में आरोप लगाया गया है कि लोकसभा अध्यक्ष के स्पष्ट निर्देश के बावजूद संसद परिसर में प्रदर्शन किया गया, जो “अध्यक्ष के आदेश की अवहेलना” और संसदीय परंपराओं का उल्लंघन है। चिट्ठी में राहुल गांधी के व्यवहार को मर्यादा और संस्थागत गरिमा का उल्लंघन बताया गया है। खुले पत्र में, हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि 12 मार्च को संसद भवन परिसर के भीतर एक विरोध प्रदर्शन के दौरान गांधी के कार्यों को 'पीठ' (Chair) की जानबूझकर अवहेलना माना जा सकता है, और यह संसदीय अधिकार के प्रति उपेक्षा को दर्शाता है।

“राजनीतिक नाटक का मंच नहीं संसद”
पत्र में कहा गया है, “संसद देश का सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान है, इसे राजनीतिक नाटक का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए।” हस्ताक्षरकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि सांसदों का संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय-बिस्किट खाना और प्रदर्शन करना “जनप्रतिनिधियों के आचरण के अनुरूप नहीं” है। खुले पत्र में कहा गया कि इस तरह का व्यवहार न केवल संसदीय प्रक्रियाओं को कमजोर करता है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचाता है।

माफी और आत्ममंथन की मांग
उन्होंने लिखा है, "संसद के हर हिस्से, सीढ़ियां, गलियारे और लॉबी की समान गरिमा है। जनप्रतिनिधियों का आचरण इन स्थानों पर भी उसी स्तर का होना चाहिए।" पत्र में यह भी कहा गया है कि बार-बार इस तरह की घटनाएं सार्वजनिक संवाद के स्तर को गिराती हैं। पूर्व अधिकारियों ने नेता प्रतिपक्ष से अपील की है कि वे देश से माफी मांगें और अपने व्यवहार पर आत्ममंथन करें, ताकि संसद की गरिमा और विश्वसनीयता बनी रहे। पत्र में कहा गया है, “एक संवैधानिक संस्था के संरक्षक के रूप में, जो एक अरब से अधिक लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का प्रतीक है, सांसदों को इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि उनके कार्यों का प्रतीकात्मक और संस्थागत महत्व होता है।”

पत्र का नेतृत्व
इस पत्र का समन्वय जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने किया। हस्ताक्षरकर्ताओं में 100 से अधिक पूर्व सैन्य अधिकारी, कई पूर्व नौकरशाह, राजनयिक और वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल हैं। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब संसद के भीतर और बाहर विरोध प्रदर्शनों को लेकर राजनीतिक माहौल पहले से ही गर्म है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद से संसदीय आचरण और लोकतांत्रिक परंपराओं पर एक नई बहस छिड़ सकती है।

 

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