भगवान श्री अग्रसेन जी ने दिया था एक ईंट-एक रूपया के सिद्धान्त से समाज को समृद्धि का संदेश

भगवान श्री अग्रसेन जी की जयंती 22 सितंबर 2025 पर विशेष

अग्रकुल प्रवर्तक एवं अग्रवाल समाज के आराध्य देव भगवान श्री अग्रसेन जी प्रतापनगर के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। धार्मिक मान्यतानुसार भगवान श्री अग्रसेन जी का जन्म अश्विनी सुदी एकम् को मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की चैंतीसवी पीढ़ी में सूर्यवशीं क्षत्रिय कुल के महाराजा वल्लभ सेन के घर में द्वापर के अन्तिमकाल और कलयुग के प्रारम्भ में 5149 वर्ष पूर्व हुआ था। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे।
भगवान श्री अग्रसेन जी के राज्य में कोई भी व्यक्ति दुखी या लाचार नहीं था। श्री अग्रसेन जी बचपन से ही प्रजा की भलाई और अपने राज्य की उन्नति के लिए लगातार प्रयत्नशील रहते थे। एक बार अग्रोहा में अकाल पड़ा। चारों ओर त्राहि-त्राहि हो गई, अव्यवस्था होने लगी। इस विकट समस्या का समाधान ढूंढने के लिए भगवान श्री अग्रसेन जी वेश बदल कर अपनी नगरी में लगे सहायता शिविर में गए, वहाँ देखा एक परिवार में मात्र चार सदस्यों का ही खाना बना था। किन्तु खाना प्रारम्भ करते समय एक अतिरिक्त मेहमान आ गया, जिसके कारण भोजन की समस्या हो गई। ऐसे में परिवार के सदस्यों ने चारों थालियों में से थोड़ा-थोड़ा भोजन निकालकर एक ओर पाँचवी थाली परोस दी। सभी के भोजन की समस्या का समाधान हो गया। श्री अग्रसेन जी ने यह वाक्य अपनी सभी में सभी को बताया और ‘‘एक ईंट और एक रूपया’’ सिद्धान्त की घोषणा की और कहा कि राज्य में आने वाले प्रत्येक नए परिवार को ‘‘एक रूपया-एक ईंट’’ दी जाए। ईंटों से वो अपने घर का निर्माण करें और रूपये से व्यापार करें। एक ईंट और एक रूपया का यह चलन अग्रवालों की पहचान बन गया जो भगवान श्री अग्रसेन जी के सच्चे समाजवाद का प्रतीक है एवं आज भी यह सिद्धान्त प्रासंगित हैं। भगवान श्री अग्रसेन ने समाज के सामने अद्भुत उदाकरण पेश कर एक नयी व्यवस्था को जन्म दिया।

राज्य की खुशहाली के लिए की थी घोर तपस्या:
भगवान श्री अग्रसेन जी ने अपनी प्रजा की खुशहाली, शांति और समृद्धि के लिए काशी नगरी जाकर शिवजी की घोर तपस्या की। जिससे भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें माता लक्ष्मी जी की तपस्या करने की सुझाव दिया। माता लक्ष्मी ने श्री अग्रसेन की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अपना एक नया राज्य बनाओं और वैश्य परम्परा के अनुसार अपना व्यवसाय करें तो उन्हें तथा उनके लोगों या अनुयायियों को कभी भी किसी भी प्रकार की आर्थिक एवं सामाजिक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

राजा नागराज की कन्या राजकुमारी से हुआ था विवाह:
भगवान श्री अग्रसेन जी को राजा नागराज की कन्या राजकुमारी माधवी के स्वयंवर में शामिल होने का न्योता मिला। उस स्वयंवर में दूर-दूर से अनेक राजा और राजकुमार आए थे। यहां तक कि देवताओं के राजा इंद्र भी राजकुमारी के सौंदर्य के वशीभूत हो वहां पधारे थे। स्वयंवर में राजकुमारी माधवी ने राजकुमार अग्रसेन के गले में जयमाला डाल दी। जहां अग्रसेन सूर्यवंशी थे वहीं माधवी नागवंश की कन्या थीं। विवाह से इंद्र जलन और गुस्से में आकर प्रतापनगर में वर्षा रोक दी। चारों ओर त्राहि-त्राही मच गयी। लोग अकाल मृत्यु का ग्रास बनने लगे। तब महाराजा अग्रसेन ने इंद्र के विरुद्ध युद्ध छेड दिया। चूंकि अग्रसेन धर्म-युद्ध लड रहे थे तो उनका पलडा भारी था, जिसे देख देवताओं ने नारद ऋषि को मध्यस्थ बना दोनों के बीच सुलह करवा दी।

अग्रवाल समाज का तीर्थ है अग्रोहा धामः
भगवान श्री अग्रसेन ने अपने नए राज्य की स्थापना के लिए अपनी अर्धाग्नी महारानी माधवी के साथ पूरे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेडिये के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। ऋषि-मुनियों और ज्योतिषियों के सुझाव पर नये राज्य का नाम अग्रेयगण रखा गया। जिसे अग्रोहा नाम से जाना जाता है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास स्थित हैं। आज भी यह स्थान अग्रहरि और अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां भगवान श्री अग्रसेन जी और माता लक्ष्मी देवी का भव्य मंदिर स्थापित है।

अग्रोहा धाम ने की दिन दूनी-रात चैगुनी तरक्की:
भगवान श्री अग्रसेन के राजकाल में अग्रोहा ने दिन दूनी-रात चैगुनी तरक्की की। कहते हैं कि इसकी चरम स्मृद्धि के समय वहां लाखों व्यापारी रहा करते थे। वहां आने वाले नवागत परिवार को राज्य में बसने वाले परिवार को सहायता के तौर पर ‘‘एक रुपया-एक ईंट’’ भेंट करते थे, इस तरह राज में बसने वाले परिवार को लाखों रुपये और ईंटें प्राप्त होने से स्थापित होने में काफी सहायता मिलती थी। जिससे वह चिंता रहित होकर अपना व्यापार प्रारंभ कर परिवार का पालन-पोषण करता था।

पशुबलि प्रथा को किया था समाप्त:
कुलदेवी माता लक्ष्मीजी की कृपा से भगवान श्री अग्रसेन के 18 पुत्र थे। राजकुमार विभु उनमें सबसे बड़े थे। महर्षि गर्ग ने महाराजा अग्रसेन को 18 पुत्र के साथ 18 यज्ञ करने का संकल्प करवाया। माना जाता है कि यज्ञों में बैठे 18 गुरुओं के नाम पर ही अग्रवंश (अग्रवाल समाज) की स्थापना हुई। उस समय अधिकतर यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी।

भगवान श्री अग्रसेन जी ने अपने राज्य में यह नियम बना रखा था कि कोई भी व्यक्ति यज्ञ में पशुबलि नहीं देगा, न पशु को मारेगा और न माँस खाएगा। राज्य का हर व्यक्ति प्राणी मात्र की रक्षा करेगा। इस घटना से प्रभावित होकर उन्होंने क्षत्रिय धर्म को अपना लिया। भगवान श्री अग्रसेन ने अपने राज्य को 18 गणों में विभाजित कर अपने 18 पुत्रों को सौंप दिया। उन्होंने 18 गुरुओं के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना की थी। हर गोत्र अलग होने के बावजूद वे सब एक ही परिवार के अंग बने रहे। इसी कारण अग्रोहा भी सर्वंगिण उन्नति कर सका। राज्य के उन्हीं 18 गणों से एक-एक प्रतिनिधि लेकर उन्होंने लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना की, जिसका स्वरूप आज भी हमें भारतीय लोकतंत्र के रूप में देखन को मिलता है।

भोपाल में भगवान श्री अग्रसेन जी एवं कुलदेवी माताजी की हो रही नियमित महाआरतीः
अग्रवाल समाज द्वारा मध्यप्रदेश के अधिकांश जिलों में भगवान श्री अग्रसेनजी की महाआरती की जा रही है। भोपाल के आईटीसी पार्क, कमला पार्क स्थित भगवान श्री अग्रसेन जी की प्रतिमा के समक्ष चैत्र नवरात्र 2024 से माह के प्रथम रविवार को प्रारंभ हुई महाआरती नियमित की जा रही है। प्रतिमा पर नियमित माल्र्यापण भी किया जा रहा है। महाआरती में अग्रवाल समाज के लोग काफी संख्या में उपस्थित होकर जजमानी करते है। नियमित महाआरती होने से समाज में आपसी भाईचोरे, एकता और संगठित होने का भाव देखने को मिल रहा है। साथ ही अग्रवाल समाज भगवान श्री अग्रसेन के करूणामीय स्वभाव, युग पुरूष, महादानी और राम राज्य के समर्थक के सिद्धांतों को अपनाकर राष्ट्र निर्माण में अपना विशेष योगदान दे रहा है।

(विनीत अग्रवाल)
संभागीय प्रदेश मीडिया प्रभारी, म.प्र. अग्रवाल महासभा (रजि.)

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