नारी सशक्तिकरण: परंपरा, संघर्ष और वर्तमान परिप्रेक्ष्य

आज वैश्विक स्तर पर महिलाएं अनेक देशों, राज्यों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, और उनमें उनकी भागीदारी लगभग 27.5% है, जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक सराहनीय स्थिति को दर्शाती है।भारत विश्व का सर्वाधिक विविधता वाला देश है, जहां अनेक भाषाएं एवं बोलियां बोली जाती हैं, और अपनी इसी सांस्कृतिक समृद्धि के कारण भारत पूरे विश्व में एक विशेष स्थान रखता है। प्राचीन समय से लेकर वर्तमान तक इन परंपराओं को संजोने का कार्य महिला और पुरुष दोनों के द्वारा किया जाता रहा है, लेकिन 21वीं सदी में भी महिलाओं को अपने सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। अनेक समाज सुधारकों— राजा राम मोहन राय, स्वामी विवेकानंद, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, पंडिता रमाबाई और डॉ. भीमराव अम्बेडकर—ने तत्कालीन समाज में स्त्रियों की समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया और उनके लिए अनुकूल वातावरण बनाया, फिर भी यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि महिलाओं को आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर का यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है कि— “यदि किसी समाज की प्रगति को जानना है, तो उस समाज की स्त्रियों की स्थिति को देखना चाहिए,” क्योंकि स्त्रियां किसी भी समाज की आधी आबादी होती हैं, और उनके बिना समाज का समग्र विकास संभव नहीं है। भारत में सांस्कृतिक विविधता चारों दिशाओं में फैली हुई है, और हर संस्कृति के केंद्र में नारी का स्थान है, क्योंकि बिना नारी के किसी भी समाज या संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। फिर भी विडंबना यह है कि नारी केंद्र में होकर भी केंद्र से दूर है। प्रसिद्ध सामाजिक विचारक सिमोन द बोउवार का कथन है—
“स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बनाई जाती है।” अर्थात समाज अपनी आवश्यकताओं के अनुसार स्त्री को ढालता आया है, और उसके निर्णयों पर पुरुषों का वर्चस्व बना रहता है, क्योंकि हम आज भी पितृसत्तात्मक मानसिकता में जी रहे हैं, जहां “लड़की हुई तो खर्चा और लड़का हुआ तो चर्चा” जैसी सोच प्रचलित है। इसलिए वर्तमान समय की मांग है कि हम इन रूढ़िवादी मानसिकताओं से ऊपर उठें और नारी सशक्तिकरण को मजबूत बनाएं।

भारत में प्राचीन काल से अनेक सभ्यताएं विकसित हुईं, जिनमें सिंधु घाटी सभ्यता प्रमुख है, जिसमें मातृसत्तात्मक व्यवस्था के लक्षण देखने को मिलते हैं। इसका अर्थ है कि उस समय स्त्री और पुरुष को समान अधिकार और सम्मान प्राप्त थे। हालांकि आज नारी सशक्तिकरण का अर्थ यह नहीं है कि पितृसत्तात्मक समाज को बदलकर मातृसत्तात्मक समाज बना दिया जाए, बल्कि इसका उद्देश्य समानता स्थापित करना है। भारत में आज भी कुछ जनजातियों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था देखने को मिलती है, जैसे पूर्वोत्तर भारत की गारो और खासी जनजातियां तथा दक्षिण भारत की नायर जाति, साथ ही विश्व के अन्य भागों में चीन की मोसुओ और कोस्टा रिका की ब्रिब्रि जनजाति भी इसके उदाहरण हैं। दुनिया में अनेक सामाजिक आंदोलन हुए, जिनमें 19वीं शताब्दी का नारी आंदोलन प्रमुख था, जो समाज द्वारा स्त्री को निम्न समझने की सोच के विरुद्ध शुरू हुआ। यह आंदोलन पुरुषों के खिलाफ नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक विचारधारा के खिलाफ था, और इसका उद्देश्य स्त्रियों को समान अधिकार, सम्मान और अवसर दिलाना था। हम हर वर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं, और इस अवसर पर हरिशंकर परसाई का यह व्यंग्य याद आता है— “दिवस कमजोरों का मनाया जाता है, मजबूत लोगों का नहीं।” अतः सशक्तिकरण का अर्थ केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक अर्थ यह है कि स्त्री अपने निर्णय स्वयं ले सके और इसके लिए वह किसी पर निर्भर न रहे।

अभिलाष चन्द्र मिश्रा
व्याख्याता सामान्य अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखक

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