सोते समय लोग क्यों करते हैं बड़बड़ाना? जानें Sleep Talking के पीछे की वजह और कब सतर्क होना जरूरी

क्या आपने कभी किसी को सोते समय बड़बड़ाते, फुसफुसाते या अचानक कुछ बोलते हुए सुना है? कई बार लोग नींद में पूरे वाक्य बोलते हैं, सवालों के जवाब देते हैं या बिना किसी स्पष्ट मतलब के आवाजें निकालते हैं। सुबह उठने पर उन्हें इसकी कोई याद भी नहीं रहती। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में Sleep Talking या Somniloquy कहा जाता है। अधिकतर मामलों में नींद में बोलना सामान्य होता है और इसके लिए किसी खास इलाज की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि, अगर यह बार-बार हो, नींद की गुणवत्ता प्रभावित करे या इसके साथ चिल्लाना, हाथ-पैर चलाना और डरकर उठना जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसके पीछे किसी दूसरी स्लीप डिसऑर्डर की भूमिका हो सकती है।
नींद में बड़बड़ाना आखिर क्यों होता है, क्या दिमाग नींद में भी पूरी तरह “ऑफ” नहीं होता?
सोते समय दिमाग पूरी तरह बंद नहीं होता, बल्कि वह अलग-अलग नींद की कई चरण से गुजरता है। इस दौरान मस्तिष्क की गतिविधियां बदलती रहती हैं और शरीर की प्रतिक्रिया देने की क्षमता भी अलग-अलग स्तर पर काम करती है। कभी-कभी नींद और जागने के बीच की स्थिति में बोलने से जुड़ी प्रक्रियाएं सक्रिय हो जाती हैं, जिससे व्यक्ति अनजाने में कुछ शब्द बोल सकता है।
स्लीप टॉकिंग को पैरासोम्निया की एक सामान्य अभिव्यक्ति माना जाता है। पैरासोम्निया उन असामान्य व्यवहारों या अनुभवों को कहा जाता है, जो सोते समय, नींद में जाते हुए या जागने के आसपास हो सकते हैं। नींद में बड़बड़ाना हल्की आवाज, अस्पष्ट शब्द, हंसी, फुसफुसाहट या स्पष्ट वाक्यों के रूप में सामने आ सकता है।
एनसीबीआई के अनुसार 2019 में एक रिव्यू के मुताबिक, नींद में बोलने की प्रक्रिया और सपनों से इसके संबंध पर शोध हुआ है, लेकिन इस घटना के कई पहलुओं को अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है। इसलिए हर बार नींद में बोलने को किसी बीमारी का संकेत मानना सही नहीं है।
क्या सपने देखने और नींद में बोलने के बीच कोई कनेक्शन होता है?
रात में बड़बड़ाने के क्या कारण होते हैं?
कई लोगों को लगता है कि जो व्यक्ति नींद में बोल रहा है, वह जरूर कोई सपना देख रहा होगा। कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर बार स्लीप टॉकिंग का कारण सपना ही हो।
सपने अक्सर REM (Rapid Eye Movement- नींद का एक चरण) स्लीप के दौरान अधिक स्पष्ट और जीवंत होते हैं। हालांकि, नींद में बोलना REM के साथ-साथ Non-REM Sleep के दौरान भी हो सकता है। यानी कोई व्यक्ति सपना याद न होने के बावजूद भी नींद में कुछ बोल सकता है।
एनसीबीआई के अनुसार स्लीप टॉकिंग और पैरासोम्निया से जुड़े लोगों की रात के दौरान निकली आवाजों और शब्दों का विश्लेषण किया गया। इसमें बड़बड़ाने, फुसफुसाने, चिल्लाने और समझ में आने वाले शब्दों जैसी अलग-अलग आवाजें दर्ज की गईं। इससे पता चलता है कि नींद में बोलने का स्वरूप हर व्यक्ति में अलग हो सकता है। यह भी ध्यान रखें कि नींद में कही गई बातों को व्यक्ति के छिपे हुए विचारों, रहस्यों या वास्तविक इरादों का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।
स्ट्रेस और एंग्जायटी बढ़ने पर नींद में बोलना क्यों बढ़ सकता है?
स्लीप फाउंडेशन के अनुसार दिनभर की चिंता, काम का दबाव, पारिवारिक समस्याएं या किसी घटना को लेकर लगातार सोचते रहना नींद को प्रभावित कर सकता है। तनाव की स्थिति में कुछ लोगों को सोने में परेशानी होती है, रात में बार-बार नींद खुलती है या बेचैन सपने आते हैं। नींद के इस तरह बाधित होने पर स्लीप टॉकिंग (Sleep Talking) भी बढ़ सकता है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि स्ट्रेस और एंग्जायटी नींद में बोलने के संभावित ट्रिगर हो सकते हैं, लेकिन हर व्यक्ति में इसका कारण यही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। किसी व्यक्ति का तनाव बढ़ने के साथ बड़बड़ाना बढ़ रहा है, तो दोनों के बीच संबंध हो सकता है; फिर भी सिर्फ इस लक्षण के आधार पर एंग्जायटी डिसऑर्डर का निदान नहीं किया जा सकता।
नींद में बड़बड़ाने के साथ ये लक्षण दिखें तो डॉक्टर से कब मिलें?
रात में बड़बड़ाने के क्या कारण होते हैं?
क्लीवलैंड क्लीनिक के अनुसार अधिकतर मामलों में स्लीप टॉकिंग नुकसानदायक नहीं होता। लेकिन कुछ लक्षणों के साथ ऐसा होने पर डॉक्टर या स्लीप स्पेशिलिस्ट से सलाह लेनी चाहिए।
वयस्क उम्र में अचानक शुरुआत: अगर पहले कभी ऐसा नहीं हुआ और अब अचानक नियमित रूप से नींद में बोलने लगे हैं।
चिल्लाना या हिंसक हरकतें: नींद में जोर से चीखना, हाथ-पैर मारना या सपनों के अनुसार शरीर चलाना।
नींद बार-बार टूटना: रात में बेचैनी, डरकर उठना या सुबह पर्याप्त आराम महसूस न होना।
दिन में अत्यधिक नींद आना: पर्याप्त समय सोने के बावजूद दिन में बहुत थकान या आलस महसूस होना।
सांस से जुड़ी परेशानी: तेज खर्राटे, सोते समय सांस रुकने जैसा दिखना या हांफते हुए जागना।
इन लक्षणों का मतलब हमेशा गंभीर बीमारी नहीं होता, लेकिन ये दूसरी स्लीप डिसऑर्डर की जांच की जरूरत का संकेत दे सकते हैं। डॉक्टर लक्षणों, दवाओं, नींद की आदतों और मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर आगे की जांच तय कर सकते हैं।
नींद में बड़बड़ाना यानी स्लीप टॉकिंग एक आम व्यवहार है, जो अक्सर किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता। सपनों, नींद के अलग-अलग चरणों, स्ट्रेस, एंग्जायटी और नींद की कमी से इसका संबंध हो सकता है। हालांकि, इसके पीछे हर बार एक ही कारण नहीं होता। यदि यह समस्या बार-बार हो रही है, नींद की गुणवत्ता बिगाड़ रही है या इसके साथ चिल्लाना, असामान्य शारीरिक हरकतें और सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। नियमित स्लीप शेड्यूल और अच्छी स्लीप हाइजीन इसे नियंत्रित करने में मदद कर सकती है।





