पश्चिम बंगाल का ममता संकट

By: Praveshnew
07-02-2019 09:07

नरेन्द्र मोदी को 2014 में सत्ता मिलने का सबसे बड़ा कारण लोगों का यह विश्वास था कि वे सरकार बनाकर भ्रष्ट लोगों को कानून के शिकंजे में लाएंगे और आगे भ्रष्टाचार न हो या न्यूनतम हो इसकी संस्थानिक व्यवस्था करेंगे, लेकिन उन्होंने इस दिशा में अपनी सरकार के प्रारंभिक चार सालों तक कुछ किया ही नहीं। भ्रष्टाचार के एक से एक बड़े मामले यूपीए की सरकार के दौरान सामने आए थे। उसके कारण एक बहुत बड़ा आंदोलन देश में हुआ था। उस आंदोलन ने कांग्रेस और उसके सहयोगियों की छवि को बुरी तरह घूमिल कर दिया। नरेन्द्र मोदी को उसी का लाभ मिला और वे पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आ गए। लेकिन सत्ता में आने के बाद वे भ्रष्टाचार के खिलाफ  जंग उनकी प्राथमिकता सूची में था ही नहीं। 

पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व स्थिति पैदा हुई, जो देश के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। इसने एक संवैधानिक संकट पैदा कर दिया और देश में राजनैतिक भूचाल खड़ा कर दिया। और यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई का लगातार राजनैतिक इस्तेमाल होता रहा है। सभी सरकारें इसका दुरुपयोग करती हैं। किसी को फ ंसाने के लिए इसका इस्तेमाल तो कम ही किया जाता है, लेकिन भ्रष्ट नेताओं को बचाकर इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है। यूपीए सरकार में भी यही हो रहा था और नरेन्द्र मोदी की सरकार में भी कुछ ऐसा ही हुआ।

नरेन्द्र मोदी को 2014 में सत्ता मिलने का सबसे बड़ा कारण लोगों का यह विश्वास था कि वे सरकार बनाकर भ्रष्ट लोगों को कानून के शिकंजे में लाएंगे और आगे भ्रष्टाचार न हो या न्यूनतम हो इसकी संस्थानिक व्यवस्था करेंगे, लेकिन उन्होंने इस दिशा में अपनी सरकार के प्रारंभिक चार सालों तक कुछ किया ही नहीं। भ्रष्टाचार के एक से एक बड़े मामले यूपीए की सरकार के दौरान सामने आए थे। उसके कारण एक बहुत बड़ा आंदोलन देश में हुआ था। उस आंदोलन ने कांग्रेस और उसके सहयोगियों की छवि को बुरी तरह घूमिल कर दिया। 

नरेन्द्र मोदी को उसी का लाभ मिला और वे पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आ गए। लेकिन सत्ता में आने के बाद वे भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग उनकी प्राथमिकता सूची में था ही नहीं। उनको सत्ता दी गई थी प्रशासनिक गंदगी की सफ ाई करने के लिए, लेकिन उन्होंने हाथ में झाड़ू उठाकर सड़कों की सफ ाई शुरू कर दी। रॉबर्ट वाड्रा की याद उनको चुनावी भाषणों के समय आती थी, लेकिन उनके खिलाफ  कार्रवाई नहीं की गई, उलटे राजस्थान सरकार ने उनको क्लीन चिट दे दिया था। नेशनल हेरॉल्ड मामले में भी ईडी ने पहले सोनिया और राहुल को क्लीन चिट दे दिया था, पर सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा हंगामा किए जाने के बाद वह मुकदमा बंद होने से बचा।

एक यादव सिंह घोटाला था। कहते हैं कि उसमें मायावती और अखिलेश या उनके परिवार के लोग फंस रहे थे। उस घोटाले पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। कॉमनवेल्थ घोटालों की गूंज भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई पड़ रही थी। उन घोटालों की सजा शीला दीक्षित को दिल्ली की जनता ने दी और वह अपना विधानसभा चुनाव भी बुरी तरह हारी। कांग्रेस तो दिल्ली में साफ  ही हो गई थी। 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का एक उम्मीदवार भी नहीं जीता। जनता ने तो सजा दे दी थी, लेकिन मोदी सरकार ने कॉमनवेल्थ गेम्स के घोटालेबाजों के खिलाफ  कुछ भी नहीं किया। एक शुंगलू रिपोर्ट आई थी। उसमें अनेक नाम आए थे। लेकिन कोई कारर्वाई नहीं हुई।

दिल्ली में घोटालेबाजों के खिलाफ  कोई कार्रवाई न हो, इसके लिए केजरीवाल सरकार की सारी ताकतें छीन ली गईं। दिल्ली पुलिस तो कभी भी दिल्ली सरकार के अधीन नहीं रही, लेकिन अंटी करप्शन ब्यूरों दिल्ली सरकार के अधीन था। मोदी सरकार ने उसे दिल्ली की केजरीवाल सरकार से छीन लिया। केजरीवाल सरकार को लोकायुक्त के गठन की इजाजत भी नहीं दी गई। यानी मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ  तो कुछ किया ही नहीं और उसने यह भी सुनिश्चित कर दिया कि केजरीवाल सरकार भी भ्रष्ट लोगों के खिलाफ  कुछ नहीं कर सके।

भ्रष्टाचार के मसले पर नरेन्द्र मोदी की सरकार ने लोगों को बहुत ही निराश किया। 2जी घोटाले के आरोपी अदालत से बरी हो गए और अदालत ने टिप्पणी की कि जांच एजेंसी ने वह मुकदमा सही तरीके से लड़ा ही नहीं। उसके अधिकारी बार बार बुलाने पर कोर्ट में आए ही नहीं और जो आए भी, वे विरोधाभासी बयान देते रहे। दस्तावेजी सबूत कुछ थे और गवाह कोर्ट में कुछ और ही बोल रहा था। और इसके कारण चर्चित 2 जी घोटाले के सभी आरोपी बरी हो गए। यह सब उस मोदी सरकार के कार्यकाल में हुआ, जिसका गठन ही भ्रष्टाचार के खिलाफ  हुए एक बड़े आंदोलन के कारण हुआ था, हालांकि उस आंदोलन का नेतृत्व मोदी की पार्टी ने नहीं किया था।

उस आंदोलन के कारण यूपीए सरकार ने एक लोकपाल कानून बनाया था। पिछली सरकार लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर पाई थी। मोदी सरकार को उसकी नियुक्ति करनी थी। अब इस सरकार का वर्तमान कार्यकाल समाप्त हो रहा है, पर अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है। लोकपाल कानून के अनुसार सेंट्रल विजिलेंस कमीशन लोकपाल के दायरे में आ जाता और सीबीआई की अपराध विरोधी शाखा भी लोकपाल के मातहत हो जाता। इस तरह सीबीआई भ्रष्टाचार के मसले पर जांच करते समय राजनैतिक दबाव से ऊपर आ जाती। लेकिन लोकपाल की नियुक्ति हुई ही नहीं है और इसके कारण सब कुछ वैसा ही चल रहा है, जैसा लोकपाल कानून के पहले चल रहा था।

अब पश्चिम बंगाल संकट की बात करें। वहां कोलकाता के पुलिस आयुक्त ने सीबीआई के साथ सहयोग नहीं किया। मामला 2014 से ही लटका हुआ है। सीबीआई के हाथ में जांच का जिम्मा आने के पहले कोलकाता के वर्तमान पुलिस आयुक्त राजीव कुमार उस एसआईटी का नेतृत्व कर रहे थे, जो शारदा और रोज वैली घोटाले की जांच कर रही थी। राजीव कुमार पर आरोप है कि उन्होंने अपनी जांच में एकत्र सबूतों को पूरी तरह सीबीआई को सौंपा ही नहीं था। उन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने कुछ सबूतों को नष्ट भी कर दिया और बार बार बुलाने पर सीबीआई अधिकारियों के सवालों का जवाब देने के लिए आए ही नहीं।

राजीव कुमार गलत कर रहे थे, लेकिन यदि वह असहयोग कर रहे थे, तो सीबीआई को बहुत पहले अदालत में उनकी शिकायत करनी चाहिए थी और वहां से आदेश लेकर उनके खिलाफ  कार्रवाई करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और एकाएक जब लोकसभा चुनाव सिर पर है, तो सीबीआई राजीव कुमार को गिरफ्तार करने ही पहुंच गई। अब यदि ममता बनर्जी इसका राजनैतिककरण कर रही हैं, तो इसमें क्या गलत है? आखिर राजनैतिक कारणों से ही जांच में विलंब हुआ और राजनैतिक कारणों से ही राजीव कुमार को गिरफ्तार करने की कोशिश हुई। यदि लोकपाल की नियुक्ति मोदी अपने कार्यकाल के पहले ही साल में कर देते, तो इस तरह की अशोभनीय घटना नहीं घटती और न ही सीबीआई के राजनैतिक इस्तेमाल का आरोप किसी पर लगता। 
 

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